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प्रतिभा कुमारी जी की रचनाएं

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प्रतिभा कुमारी  गजल 1. पहेलियाँ ऐसे मत बुझाया कर। रंजिशें हो तो खुलकर बताया कर। जो दिखता है पूरा सच नहीं होता, लाइव कभी वो सच भी दिखाया कर। देखो ऊपर वाले सब देखते हैं, नेकी कर,दरिया में डाल आया कर। झूठ व फरेब का यूँ स्वांग रचा कर, अपने हक में न सबूत जुटाया कर। साबित क्या करना चाहते हो बता, जो दिल में छुपा, जुबां पर लाया कर। सुर्खियाँ बटोरने के चक्कर में तुम, रिश्तों को दाँव पर मत लगाया कर। अभी उम्र है कैरियर बनाने की, किताबों से जी भर दिल लगाया कर। फेसबुक,गेम,इंस्टाग्राम की लत में, सुनहरे भविष्य को मत भुलाया कर। माँ- बाप तेरा भला ही सोचेंगे, सवाल इनकी फिक्र पर मत उठाया कर। सुन,जीतकर भी सब हार जाओगे, गेम अपनों से मत आजमाया कर। लिखने वाले तो सच ही लिखेंगे, तू पढ़कर इसे दिल से न लगाया कर। 2. मुझे जीने की तू दुआ न दे। ऐ खुदा तू ऐसी सजा न दे । अभी राख में है शोले बहुत, इसे बेरूखी की हवा न दे। है मोम सी अभी हर आरजू, ये तपिश इसको घुला न दे। तुझे सौंपे थे वो जिस यकीन से, उस उम्मीद का ये सिला न दे  उस भरोसे का तो मान रख, उस आत्मा को यूँ दगा न दे। लुटे हसरतों के मजार पर, उम्मीद की कोई...