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प्रभाष बहरदार जी की रचनाएं

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प्रभाष बहरदार क्या यही जवानी है? भविष्य खोज रहे हो  नवीन-हथियारों में  तितलियाँ उड़ाते हो  मोहक गलियारों में                 नवयुग-निर्माता की                क्या यही निशानी है?                 क्या यही जवानी है? इस क्रूरतम-काल में  वीरता दबाते हो  देश की रक्षा हेतु विनय-गान गाते हो               सुभाष और भगत की               क्या यही कहानी है?               क्या यही जवानी है? अगर वीर-जवान हो  जवानी की कसम है  सिद्ध कर अपनी शक्ति तुझमें कितना दम है                अबोध बालक-सा यह                अरे, क्या नादानी है?                क्या यही जवानी है? उसका नाम जवानी है गिर-गिर कर संभलना तुम  संभल-संभल क...

डॉ. विनय कुमार चौधरी जी का रचना संसार

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डॉ. विनय कुमार चौधरी कद से छोटे का अंधकार कद से छोटे का अहंकार बड़ा होता है, आदमी कुछ नहीं सरोकार बड़ा होता है; लोग क्योंकर यहाँ नफ़रत के बीज बोते हैं? ये जानते हुए कि प्यार बड़ा होता है; याद रहता न वो चेहरा, न जिसमें दाग़ कोई, चाँद होकर भी दागदार, बड़ा होता है; अपने दायित्व को, कर्तव्य को भुला बैठे, उसपे कहते हैं कि अधिकार बड़ा होता है; तेज भी चाहिये सूरज - सा चमकने के लिए, मरे हुए पे अंधकार बड़ा होता है। लोक शास्त्र के बीच लोक शास्त्र के बीच खत्म हो सकती कभी लड़ाई क्या? सदियों का शोषक, हो सकता आज अचानक भाई क्या? भाग्य और भगवान, कर्मफल की धारणा प्रतिष्ठित की, ऐसे कथित देवता से हो सकती कभी भलाई क्या? ओ समाज के पीड़ित बहुजन, पहचानो अपनी ताकत, बिना प्रयत्न पाट सकते मंजिल की कठिन चढ़ाई क्या? तुम हनुमान बनो तो सोने की लंका भी ढह सकती, काम तुम्हारा कर दे सकता केवल राम दुहाई क्या? सबका मालिक एक अगर है समदृष्टि भी रक्खेगा, वर्गभेद या वर्ण भेद की बही गड़ेगा खाई क्या? साक्षर - शिक्षित की महिमा को तुम न पहचानोगे, मेट सकोगे क्या लिलार पर जमी युगों की काई क्या? जो पर्वत श्रृंखला की तरह जो पर्वत श्रृं...

प्रतिभा कुमारी जी की रचनाएं

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प्रतिभा कुमारी  गजल 1. पहेलियाँ ऐसे मत बुझाया कर। रंजिशें हो तो खुलकर बताया कर। जो दिखता है पूरा सच नहीं होता, लाइव कभी वो सच भी दिखाया कर। देखो ऊपर वाले सब देखते हैं, नेकी कर,दरिया में डाल आया कर। झूठ व फरेब का यूँ स्वांग रचा कर, अपने हक में न सबूत जुटाया कर। साबित क्या करना चाहते हो बता, जो दिल में छुपा, जुबां पर लाया कर। सुर्खियाँ बटोरने के चक्कर में तुम, रिश्तों को दाँव पर मत लगाया कर। अभी उम्र है कैरियर बनाने की, किताबों से जी भर दिल लगाया कर। फेसबुक,गेम,इंस्टाग्राम की लत में, सुनहरे भविष्य को मत भुलाया कर। माँ- बाप तेरा भला ही सोचेंगे, सवाल इनकी फिक्र पर मत उठाया कर। सुन,जीतकर भी सब हार जाओगे, गेम अपनों से मत आजमाया कर। लिखने वाले तो सच ही लिखेंगे, तू पढ़कर इसे दिल से न लगाया कर। 2. मुझे जीने की तू दुआ न दे। ऐ खुदा तू ऐसी सजा न दे । अभी राख में है शोले बहुत, इसे बेरूखी की हवा न दे। है मोम सी अभी हर आरजू, ये तपिश इसको घुला न दे। तुझे सौंपे थे वो जिस यकीन से, उस उम्मीद का ये सिला न दे  उस भरोसे का तो मान रख, उस आत्मा को यूँ दगा न दे। लुटे हसरतों के मजार पर, उम्मीद की कोई...

डॉ. अशोक सिंह तोमर जी की रचनाएं

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  डॉ. अशोक सिंह तोमर मेरा परिचय मुझ से कौन परिचित नहीं है देश में, मुझे जानते हैं सब विदेश में, सब करते मुझसे प्यार स्वदेश में, बात किसी व्यक्ति की हो या सरकारी, पदाधिकारी हो या भिखारी नेता हो या अभिनेता रखते हर कोई मुझसे नाता मेरे प्रेम में पागल होकर मुझे पाते हैं सब कुछ खोकर। ताज और तख्त बदल जाता है जीवन का अंदाज बदल जाता है बदल जाती है दोस्ती, दुश्मनी में परिचित अजनबी में दरक जाता है पति - पत्नी का सम्बन्ध  टूट जाते हैं सुर, लय और छन्द  है मुझमे इतनी शक्ति करते कौन नहीं मेरी भक्ति। है कहाँ मेरे लिए धर्म और सम्प्रदाय  है कहाँ मेरे लिए जातिवाद। दुनियाँ के सभी धर्म और मजहब के लोग मुझसे प्यार करते हैं। जीवन के हर मोड़ पर मेरी अनिवार्यता को स्वीकार करते हैं। मानते हैं, जानते हैं अनेक नाम से कहीं डॉलर, कहीं करेंसी, कहीं रुपये, कहीं टाका कहते हैं मेरा परिचय यही जिसे सब जानते हैं। इस ब्लाग की रचनाये स्वयं लेखकों के द्वारा दी गई है तथा इन रचनाओं का स्वताधिकार उनके पास है। धन्यवाद। संक्षिप्त परिचय नाम : डॉ. अशोक सिंह तोमर जन्म : 5 जनवरी 1959 पता : ग्राम + पोस्ट - खुटहा बैजन...

कैलाश बिहारी चौधरी जी के गीत

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  कैलाश बिहारी चौधरी संक्षिप्त परिचय नाम - श्री कैलाश बिहारी चौधरी जन्म - 17 अप्रैल 1970 स्थान / वर्तमान पता -  ग्राम / पोस्ट - खगहा, मीरगंज, धमदाहा  जिला - पूर्णियां, पिन- 854304 ( बिहार ) शिक्षा - बी. ए सम्प्रति - कृषक अभिरुचि - साहित्यिक, साँस्कृतिक, सामाजिक गतिविधियों से लगाव एवं कई पत्र-पत्रिकाओं के संपादन संयोजन में सहयोग लेखन विधा - कविताएँ, गीत, ग़ज़ल, क्षणिकाएँ, कहानी, निबन्ध, एवं संस्मरण समीक्षा अनेक पत्र पत्रिकाओं में प्रकाशित एवं आकाशवाणी, दूरदर्शन केन्द्रों से सैकड़ों रचनाएं प्रसारित। प्रकाश्य कृतियां - आपके लिए (कहानी संग्रह), अभिव्यक्ति के स्वर (लघुकथा संग्रह), जीवन का सच (खण्डकाव्य), लक्ष्मण (खण्डकाव्य), श्रवण (खण्डकाव्य), गीत तेरे लिए (कविता संग्रह) आदि। सम्पादन - विगत 23 वर्षों से तरुणोदय (पत्रिका) का सम्पादन। संस्थापक / संगठनकर्ता - तरुणोदय सांस्कृतिक विकास परिषद, हिन्दी साहित्यिक, संगठन के संस्थापक/ पूर्व अध्यक्ष/ कोषाध्यक्ष। विशेष योगदान - साहित्यिक, सांस्कृतिक कार्यक्रमों में सक्रिय सहभागिता, मंचिय कवि एवं कई संस्थानों के संरक्षक, सदस्य । पुरस्कार / ...

पादप - ई. आलोक राई (हिन्दी कविता)

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ई. आलोक राई शिक्षा- बी. टेक. (मैकेनिकल इंजीनियरिंग) पिता का नाम- ध्रुव नारायण सिंह राई पत्रिकाओं में प्रकाशित - क्षणदा (त्रैमासिक), संवदिया (त्रैमासिक), जन आकांक्षा  त्रिवेणीगंज, सुपौल, बिहार पादप बीज से पादप तब विशालतम वृक्ष जीवन योग्य वायु दाता  वृक्ष होता हरा-भरा करता रहता वायु संतुलित इसके पत्ते झड़कर  मृदा शक्ति बढ़ाता वृक्ष के नीचे गर्मी में करता सबको शीतल संतुलित मौसम करने में होता योगदान इसका जड़े फैलाकर अपने बारिश के ऋतु में भू-क्षरण को रोकता प्रकृति के सौंदर्य का एक भाग यह विभिन्न प्रजातियां इनकी  तथा रंग रूप अनेक देते कई प्रकार के फल औषधीय गुण विविध रंग-बिरंगे फूल दृश्य लुभावन प्रकृति की रचना ये अनुपम जिसे काट बस रही आबादी बना रहे पलंग-किबाड़ चिंतन जरूरी जीवन की बचाओ इसे जिससे बचे सृष्टि बचाओ पेड़। बचाओ पेड़। इस ब्लाग की रचनाये स्वयं लेखकों के द्वारा दी गई है तथा इन रचनाओं का स्वताधिकार उनके पास है। धन्यवाद। Read more डॉ. अलका वर्मा प्रतिभा कुमारी जी, गीत - शबनम से भींगी गुलाब क्यों है डॉ. इन्दु कुमारी की रचना साहित्यकोसी पर सुरेन्द्र भारती जी(गीतकार) के ग...

प्रेम की पीड़ा से भरपूर एक काव्यकृति “कुछ तेरी कुछ मेरी बात” (पुस्तक समीक्षा) -डा. धर्मचन्द्र विद्यालंकार

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  🔗 कुछ तेरी कुछ मेरी बात डॉ. अलका वर्मा (पुस्तक-समीक्षा) प्रेम की पीड़ा से भरपूर एक काव्यकृति “कुछ तेरी कुछ मेरी बात” डॉ. धर्मचन्द्र विद्यालंकार कविता ही मानव मन की भावाभिव्यक्ति की प्रथम साधन है। सारे राग-विराग और घात-प्रतिघात उसी के माध्यम से व्यंजित होते रहते हैं मानव जीवन के । आप भी वही आपबीती के माध्यम से जगबीती का सशक्त साधन है। ‘कुछ तेरी कुछ मेरी बात’ नामक एक काव्यकृति हाल ही में हमारी नजरों से गुजरी है। जिसकी जो रचयिता कवयित्री है वे हैं डा. अलका वर्मा, बिहार की ऋतुपरिवर्तन का प्रबल प्रभाव आखिर कवि मानस पर होता ही है। शारदीय पूर्णिमा के आगमन की अगवानी वे इसी रुप में करती हैं- “प्रकृति ने किया श्रृंगार बहाकर बासन्ती क्यार। सुरभित है आंगन-द्वार मैया आने वाली है।” माँ की ममता के महत्व को भी यह कवयित्री बखूबी समझती है। उसकी ममता का कोई मूल्य कहाँ है। माँ के प्रति सहज समर्पण को ही वे सबसे बढ़कर भक्ति और पूजा मानती है- “करते हो माँ का तिरस्कार, सारे जप-तप तीर्थ बेकार। उनके चरणों में दुनिया है पड़ी, माँ का आँचल जादू की छड़ी।” अब ग्रामीण प्राकृतिक परिवेश में जो बड़े-बड़े बदलाव शह...