डॉ. विनय कुमार चौधरी जी का रचना संसार
डॉ. विनय कुमार चौधरी कद से छोटे का अंधकार कद से छोटे का अहंकार बड़ा होता है, आदमी कुछ नहीं सरोकार बड़ा होता है; लोग क्योंकर यहाँ नफ़रत के बीज बोते हैं? ये जानते हुए कि प्यार बड़ा होता है; याद रहता न वो चेहरा, न जिसमें दाग़ कोई, चाँद होकर भी दागदार, बड़ा होता है; अपने दायित्व को, कर्तव्य को भुला बैठे, उसपे कहते हैं कि अधिकार बड़ा होता है; तेज भी चाहिये सूरज - सा चमकने के लिए, मरे हुए पे अंधकार बड़ा होता है। लोक शास्त्र के बीच लोक शास्त्र के बीच खत्म हो सकती कभी लड़ाई क्या? सदियों का शोषक, हो सकता आज अचानक भाई क्या? भाग्य और भगवान, कर्मफल की धारणा प्रतिष्ठित की, ऐसे कथित देवता से हो सकती कभी भलाई क्या? ओ समाज के पीड़ित बहुजन, पहचानो अपनी ताकत, बिना प्रयत्न पाट सकते मंजिल की कठिन चढ़ाई क्या? तुम हनुमान बनो तो सोने की लंका भी ढह सकती, काम तुम्हारा कर दे सकता केवल राम दुहाई क्या? सबका मालिक एक अगर है समदृष्टि भी रक्खेगा, वर्गभेद या वर्ण भेद की बही गड़ेगा खाई क्या? साक्षर - शिक्षित की महिमा को तुम न पहचानोगे, मेट सकोगे क्या लिलार पर जमी युगों की काई क्या? जो पर्वत श्रृंखला की तरह जो पर्वत श्रृं...