कैलाश बिहारी चौधरी जी के गीत
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| कैलाश बिहारी चौधरी |
संक्षिप्त परिचय
नाम - श्री कैलाश बिहारी चौधरी
जन्म - 17 अप्रैल 1970
स्थान / वर्तमान पता -
ग्राम / पोस्ट - खगहा, मीरगंज, धमदाहा
जिला - पूर्णियां, पिन- 854304 ( बिहार )
शिक्षा - बी. ए
सम्प्रति - कृषक
अभिरुचि - साहित्यिक, साँस्कृतिक, सामाजिक गतिविधियों से लगाव एवं कई पत्र-पत्रिकाओं के संपादन संयोजन में सहयोग
लेखन विधा - कविताएँ, गीत, ग़ज़ल, क्षणिकाएँ, कहानी, निबन्ध, एवं संस्मरण समीक्षा अनेक पत्र पत्रिकाओं में प्रकाशित एवं आकाशवाणी, दूरदर्शन केन्द्रों से सैकड़ों रचनाएं प्रसारित।
प्रकाश्य कृतियां - आपके लिए (कहानी संग्रह), अभिव्यक्ति के स्वर (लघुकथा संग्रह), जीवन का सच (खण्डकाव्य), लक्ष्मण (खण्डकाव्य), श्रवण (खण्डकाव्य), गीत तेरे लिए (कविता संग्रह) आदि।
सम्पादन - विगत 23 वर्षों से तरुणोदय (पत्रिका) का सम्पादन।
संस्थापक / संगठनकर्ता - तरुणोदय सांस्कृतिक विकास परिषद, हिन्दी साहित्यिक, संगठन के संस्थापक/ पूर्व अध्यक्ष/ कोषाध्यक्ष।
विशेष योगदान - साहित्यिक, सांस्कृतिक कार्यक्रमों में सक्रिय सहभागिता, मंचिय कवि एवं कई संस्थानों के संरक्षक, सदस्य ।
पुरस्कार / सम्मान - महाकवि आरसी सम्मान देव साहित्य परिषद समस्तीपुर 2006, मदनलाल अग्रवाल रजत सम्मान हिन्दी भाषा साहित्य परिषद खगड़िया 2009, राष्ट्रकवि दिनकर सम्मान पटना बिहार 2011, साहित्य सुमन सम्मान पूर्णियां साहित्य संगठन 2012, गोपाल सिंह नेपाली सम्मान तरुण सांस्कृतिक चेतना समिति शेरपुर समस्तीपुर 2015, सम्पादक शिरोमणि सम्मान, हिन्दी शोध संस्थान बांका झारखण्ड 2016, आकाश कविघोष रत्न सम्मान लखनऊ उत्तर प्रदेश 2024।
सम्पर्क सूत्र - 9631320980
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बरसात का मौसम है
थोड़ी देर ठहर जाओ,
बरसात का मौसम है।
कब कहा से आए बादल,
कब कैसे बरस जाये।
कब तक बरसे बादल,
कुछ कहा नहीं जाए।
थोड़ी देर ठहर जाओ,
बरसात का मौसम है।
कजरारे काले बादल,
दिगंत में छा गए हैं।
बिजली चमक रही है,
छटाये गरज रही है।
थोड़ी देर ठहर जाओ,
बरसात का मौसम है।
यहाँ - वहाँ , जहाँ - तहाँ ,
कीचड़ ही कीचड़ है।
जल का जमाव है,
आया बरसात है।
थोड़ी देर ठहर जाओ,
बरसात का मौसम है।
किसको अपनी व्यथा सुनायें
इस जीवन में कितना गम है।
सोच - सोच घबराता मन,
किसको अपनी व्यथा सुनायें ।
आपस के सम्बन्ध हमारे,
कभी ये बनते, कभी बिगड़ते,
स्वार्थ भरी यह दुनिया लगती,
किसको अपनी व्यथा सुनायें ।
नये दौड़ की चकाचौंध में,
नैतिकता यूँ घटती जाती।
ख़ुद को अब हैरान यहाँ हुँ ,
किसको अपनी व्यथा सुनायें ।
कौन सुनेगा, किसे सुनायें,
कौन सगा है, मुझे बतायें।
किसको अपनी व्यथा सुनायें।
गीत उमंगों से गाता हूँ
व्यथित हृदय से कविता करता,
निज भावों को सहलाता हूँ।
दुख दर्दों में हसता रहता,
मुसीबतों से टकराता हूँ।
कोशिश यूँ ही करता रहता,
स्वयं सफल हो जाता हूँ।
उत्साह में मैं गुनगुनाता,
गीत को उमंगों से गाता हूँ।
सहज सजग रहता मैं हरपल,
आगे बढ़ता जाता हूँ।
कष्ट यहाँ मैं सहता रहता,
नहीं कभी घबराता हूँ।
मतलब का संसार निराला,
यहाँ मैं मस्त होकर जीता हूँ।
गीत सदैव मैं गुनगुनाता,
गीत उमंगों से गाता हूँ।
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