प्रभाष बहरदार जी की रचनाएं

प्रभाष बहरदार


क्या यही जवानी है?


भविष्य खोज रहे हो 

नवीन-हथियारों में 

तितलियाँ उड़ाते हो 

मोहक गलियारों में 

               नवयुग-निर्माता की

               क्या यही निशानी है? 

               क्या यही जवानी है?

इस क्रूरतम-काल में 

वीरता दबाते हो 

देश की रक्षा हेतु

विनय-गान गाते हो

              सुभाष और भगत की

              क्या यही कहानी है?

              क्या यही जवानी है?

अगर वीर-जवान हो 

जवानी की कसम है 

सिद्ध कर अपनी शक्ति

तुझमें कितना दम है 

              अबोध बालक-सा यह 

              अरे, क्या नादानी है?

               क्या यही जवानी है?



उसका नाम जवानी है


गिर-गिर कर संभलना तुम 

संभल-संभल कर चलना तुम 

चलकर सत्य राह पर जो 

लिखता नई-कहानी है 

उसका नाम जवानी है ।


हर मुश्किल, बाधाओं पर 

रक्तों से कर हस्ताक्षर 

मरण को जीवन बनाए

देकर जो कुरबानी है 

उसका नाम जवानी है ।


उन्नति की बाधाओं से 

निर्दय-नियम प्रथाओं से 

कर स्वतंत्र समाज को 

तोड़, बेड़ी पुरानी है 

उसका नाम जवानी है ।


अंध-परंपरा को तोड़ 

लोकहित इसे अभी मोड़ 

पीछे न हटे कदम कभी

देश-प्रेम की वाणी है 

उसका नाम जवानी है ।


हो न घायल यह लोकमन 

ध्यान सदा हो जन-गन-मन 

लोकहित सोच ही केवल

सच, विचार इंसानी है 

उसका नाम जवानी है ।



यह कैसी हवा चली है?


कि प्रेम-अहिंसा देश में 

हिंसा-नफरती रेस में 

उलझ गए हैं लोग सभी 

           चारो-ओर खलबली है 

           यह कैसी हवा चली है? 


अमृत-सा-जल सदियों से 

बहता था जिन नदियों से 

उन नदियों के जल में अब 

            दूषित गंध, बस पली है 

            यह कैसी हवा चली है? 


नीम-पीपल और पलाश 

बदल रहे अपने लिबास 

सूरज की प्रचंड गर्मी 

            जलाती दूबस्थली है

            यह कैसी हवा चली है? 


बहरा-गूँगा नाच रहा 

मद पैसों का, बाँच रहा 

वक्ता की बस्ती में भी 

            सन्नाटा, गली-गली है 

            यह कैसी हवा चली है? 


बच सकते नाग-वंश से 

कठिन किंतु मनुज-दंश से 

इन जहरीली हरकत से 

             अब हर दिशा विषैली है 

              यह कैसी हवा चली है? 



परिवार


परिवार 

मात्र एक शब्द नहीं 

संपूर्ण संसार है 

बच्चे, पत्नी

भाई-बहन 

स्नेह की डालियाँ हैं 

माता-पिता 

दादा-दादी 

मात्र एक सदस्य नहीं होते

बल्कि

चिलचिलाती धूप में 

बरगद की छाँव हैं

अँधेरी की गुफा में 

जलते दीपक हैं 

प्यास के रेगिस्तान में

जलाशय हैं 

भँवर में 

फँसी नाव की

पतवार हैं 

उम्मीदों की उड़ान हैं 

हर समस्याओं के समाधान हैं 

परिवार में जब 

प्रेम-एकता का 

एक आकाश तना हो

तो आनेवाली पीढ़ी के लिए यह 

एक सुगम राह बन जाती है 

फिर इतिहास बनना

आसान हो जाता है 

लेकिन 

जब परिवार टूटता है तो 

मुस्कुराते बाग 

जलकर खाक हो जाते हैं 

परिवार टूटने का 

परिणाम जग विदित है 

गहराई से तो देखो

रावण, कौरव और दशरथ की 

दुर्दशा भूल गए क्या..? 

क्या परिवारिक टूटन ही

जिम्मेदार नहीं हुआ था..?

फिर वही गलती करना चाहते हो..?

सावधान !

केवल और केवल 

परिवारिक एकता 

और प्रेम के बाग को 

सींचकर ही

चेहरों पर 

मुस्कुराहट लायी जा सकती है 

सुख-सपनों का संसार 

बसाया जा सकता है 

अगर परिवार 

बचा रहा तो 

स्वत: संसार बच जायेगा ।



भूख की आग


जब लगती है आग 

किसी घर में 

तो आस-पास की

सारी वस्तुओं को

जलाकर राख कर देती है 

लेकिन उसकी भी

एक सीमा है

कुछ ही घरों तक 

धधकती ज्वाला 

सिमटकर शांत हो 

जाती है।


लेकिन जब लगती है 

भूख की आग 

सुलगती रहती है 

धीरे-धीरे 

पार कर जाती है 

अपनी चरम सीमा 

अंतहीन बुभुक्षा

तब नष्ट होने लगता है 

विवेक और धैर्य 

आचरण और संस्कार 

डगमगाने लगती है सभ्यता 

उचित-अनुचित के 

दीपक बुझने लगते हैं 

और आदमी 

इतना गिर जाता है कि 

उसे गिरने का 

भय ही नहीं रहता 

मानवता शर्मसार हो जाती है 

भूख की आग 

बढ़ती ही रहती है...।



प्रसिद्धि


परीक्षा में नकल कर 

डिग्रियाँ तो मिल सकती हैं 

लेकिन 

जीवन की उपलब्धियाँ नहीं 

लोगों के मन में 

जगह बनाने के लिए 

प्रसिद्धि के शिखर पर 

चढ़ने के लिए 

अंदर की आग को 

सुलगाना पड़ता है 

स्वयं से लड़ना पड़ता है 

कदम-कदम को 

काँटे की गलियों से 

मुठभेड़ करना पड़ता है 

आत्म विश्वास से 

सरावोर मन को 

संयम की लहरों पर 

तैरना पड़ता है 

और.. और... 

तब मिलती है किसी को 

प्रसिद्धि

विवेकानंद की तरह

गाँधी की तरह 

अंबेडकर और कलाम 

की तरह

क्या तुम ऐसा कर सकते हो...?

जरूर कर सकते हो 

यदि मन में 

ठान लिया तो......।



इस ब्लाग की रचनाये स्वयं लेखकों के द्वारा दी गई है तथा इन रचनाओं का स्वताधिकार उनके पास है। धन्यवाद।



संक्षिप्त परिचय 

नाम :- प्रभाष बहरदार

माता :- श्रीमती रेणु देवी 

पिता :- श्री सेवी बहरदार "भगत जी" 

                      (सदस्य जिला परिषद, नरपतगंज)

गुरु :- मांगन मिश्र "मार्त्तण्ड" (प्रधान संपादक "संवदिया")


जन्म तिथि :- 07 मार्च 2002

जन्म स्थान :- ग्राम- दुर्गापुर, वार्ड नंबर-05, पोस्ट- तामगंज, 

                        प्रखंड- नरपतगंज, जिला- अररिया (बिहार)                                             

शिक्षा :- बी.ए. (हिन्दी),

            एम.ए. (हिन्दी)

पेशा :- छात्र 

प्रकाशित कृति:- अंतर्मन के दीप (काव्य-संग्रह) (संवदिया प्रकाशन, 2025)


शीघ्र प्रकाश्य कृतियाॅं :- नज़रिया (लघुकथा-संग्रह),

                                प्रेम-ककहरा (काव्य-संग्रह) 

लेखन: (हिंदी में), कविता, गीत, लघुकथा, कहानी, संस्मरण ।

              (भोजपुरी व अंगिका में, केवल "गीत" संगीत के रूप में 

               यूट्यूब व अन्य सोशल मीडिया पर।)


पत्र पत्रिकाएं:- संवदिया, स्मारिका व अन्य सोशल मीडिया पर।   

                        निरंतर प्रकाशित व पोस्ट आदि। 

रुचि :- लेखन, गायन व चित्रकला। 


सम्मान :- (1) 'विराट साहित्य संगम' सम्मान , विराटनगर,(नेपाल)2023, (2) गणेश शंकर विद्यार्थी स्मृति सम्मान, फारबिसगंज 2025, (3) युवा साहित्य सम्मान, कला भवन पूर्णियाँ 2025 ।

                 

संपर्क पता :- ग्राम- दुर्गापुर, वार्ड नंबर-05, पोस्ट- तामगंज, 

                      प्रखंड- नरपतगंज, जिला- अररिया (बिहार)

                      पिन कोड- 854318

मोबाइल :- 6205808744

ईमेल :- prabhashbahardar101@gmail.com

फेसबुक:- Prabhash Bahardar 

इंस्टाग्राम:- prabhash_bahardar_01



प्रभाष बहरदार जी की पुस्तक

अंतर्मन के दीप
(काव्य संग्रह)
प्रभाष बहादर




Some other related links👇









Advertise 
कोशीक साहित्यिक संस्कृति
(अनुसंधान एवं संस्कृति)
अशोक सिंह तोमर


Advertise 





Some other related blogs will be uploaded soon...

Comments

Popular posts from this blog

ध्रुव नारायण सिंह राई जी की कविता अभाव

प्रतिभा कुमारी जी, गीत - शबनम से भींगी गुलाब क्यों है

डॉ. अलका वर्मा