जीवन - ई. आलोक राई


ई. आलोक राई











जीवन 

सरसराता पवन
खिले फूलों 
और भवरों का गूँजन
इस नभ तल में 
हुँ मैं भी
इस छोर से
उस डोर को
पकर के चला
अभी है नैया 
बीच मजधार
लगा जोर 
करना पार

इच्छा, कर्म, जिम्मेवारी
आती जीवन में
कर्म अगर
लक्ष्य रहा
क्या बाकी पूरा होता
मन बुदबुदाये
कभी संसय तो
कभी दृढ़ हो जाए 

इच्छाएं अनंत ले जाती
जिम्मेवारी फिर पुकारती
लिये सोच कर्मो की
और इच्छाएं 
मंडराते बादलों पर 
मन का विचरन 
और निज धरा पर
स्वयं का कर्मबन्धन।
.........................




इस ब्लॉग की रचनाये स्वयं कवियों/लेखकों द्वारा दी गई है तथा इन रचनाओं का स्वताधिकर उनके पास है। धन्यवाद।




संक्षिप्त परिचय

नाम : ई. आलोक राई 
पिता : ध्रुव नारायण सिंह राई
पता : स्थान - त्रिवेणीगंज, जिला - सुपौल, राज्य - बिहार, पिन - 852139

शिक्षा -  बैचलर ऑफ टेक्नोलॉजी इन मैकेनिकल इंजीनियरिंग 

पत्रिकाओं में- क्षणदा (त्रैमासिक), जन आकांक्षा (जन लेखक संघ की केंद्रीय पत्रिका), संवदिया (त्रैमासिक)तथा कुछ ऑनलाइन प्लेटफॉर्म से प्रकाशित 

सम्मान - जन साहित्य सम्मान 2024, जन लेखक संघ के द्वारा प्राप्त हुआ है, साथ ही कुछ सम्मेलनों के प्रमाणपत्र हैं। 

प्रकाश्य कृति - फिसलती रेत (विद्या - काव्य लेखन)

संपर्क सूत्र:- 9117675610




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Comments

  1. बहौत हीं अच्छी कविता है।।।जीवन के लक्ष्य को अपने कर्मों से संबंध बनाकर चलना काफी कठिन होता है और यदि हम ऐसा कर लेते हैं तो हमारे जीवन नव रस और उमंग से भर उठेगा।
    लेखनी काफी सराहनीय है और बेहद तारीफेकाबिल।

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