मार्त्तण्ड जी के नवगीत

मार्त्तण्ड



बीत रहे हैं दिन

गुमसुम-गुमसुम चुप्पी ओढ़े
बीत रहे हैं दिन
हर आभाव के नोक-झोक में
चुभते हैं दुर्दिन

कैद हुआ को कर महलों में
नयी सदी जीते
रोज आधुनिक भाग-दौड़ का
कुंठा-विष पीते

भोर-साँझ की बेला ओझल
चंदा लगे मलिन

अब तो पनघट-पनिहारिन की
पायल-धुन है गुम
मौसम-गंध हुई बंजारिन
संवेदन गुमसुम

नयनों का संवाद मौन है
बोझिल है पल-छिन

पतझड़-सी रसहीन 
रिश्तों की राहें
स्वर्ण-महल में ही जीने की
सबकी है चाहें

दिन की चिंताएँ पहाड़-सी
रातें हुई कठिन




घर कोई अखबार नहीं

ऊपर-ऊपर
बातें मीठी
भीतर निश्छल प्यार नहीं

बड़का जिद पर अड़ा हुआ
महल बनेगा आधा घर
आँसू झरते ममता के
भींगा-भींगा कच्चा घर

रिश्ता वही कटा
रिश्तों से
करता जो मनुहार नहीं

ले ले मेरा हिस्सा भी
उगे न आँगन दीवार
सिर पर छत माँ-बाबू के
हो शुभ, सुंदर घर-द्वार

घर की बात
रहे घर में ही
घर कोई अखबार नहीं

रिश्तों के इस वैभव में
पुरखों के आशीष बहुत
जन्म-जन्म की शुभ संस्कृति
यह बुनियाद बड़ी अद्भुत 

समझो तो
मातृत्व-भाव, क्या
होता है आधार नहीं?




रोटी है पूनम जैसी

यह दिल्ली
नफरत का जंगल
मुरझाएँ  जो
फूल चुने

अंतिम माह दिहाड़ी का
उड़ मन, खोजो फिर दाना
लोहा हो या हो टिम्बर
सब को पड़ता पिघलना

आनी-जानी
यह दुनिया है
ढहा वही जो
नीड़ बुने 

रोटी है पूनम जैसी
देख - देख ललचाएँ  हम
काम खोजने पर मिलते
मेहनत ज्यादा पैसे कम

रोज उगा
हिम्मत का सूरज
अस्त हुआ
बिन कहे-सुने

दिल्ली-सूरत श्रम करते
कहलाते हम बिदेसिया
छठ की याद बहुत आये
घर की कब मिले पिरिकिया

खिलना होगा
मन-कपास को
चलो अभी कुछ
और धुनें



नयी सदी

नयी सदी
क्यों धीरे-धीरे
परंपरा से हटती जाती

बाजारवाद की लय पर ही
आज भैरवी नाच रही
पश्चिम-संस्कृति की गाथा को
अभय निरंतर बाँच रही

अपनी संस्कृति की ही
जड़ क्यों 
धीरे-धीरे कटती जाती?

किस लालचवश जन-जीवन भी
बाजारों को चाह रहा
रात-दिवस अम्मा-बाबू का
पल-पल बदन कराह रहा

प्रीति नहीं है
बाजार तुझे
क्यों दुनिया आज
ठगी जाती?

कच्चे घर का दर्द भूल, खुश
कंकरीट का है जंगल
विकल हृदय पीपल, पोखर का
कैसे होगा अब मंगल?

भार सदी का
सह न सकेगी
छाती भू की फटती जाती




फण कुचलो

चंदन वन में डेग-डेग पर
साँप घूमते फण कुचलो

लोकतंत्र के ये घोड़े
सिर उठा हिनहिना रहे
अपशब्दों को पढ़ कौए
अपना चरित गिना रहे

शोक मग्न हैं सभी दिशाएँ 
तुम भी धारा में बह लो

जहर सभी धर्म-ध्वजाएँ 
बिखरे मन अभी सजाएँ 
अपाहिज संबंध सारे
तक्षकें फण को दिखाएँ 

किरणें सूरज की, जुगनू के
हाथ कैद, अधिक न मचलो

श्रृंगाल-नाभि से कब है
निकली कस्तूरी गंध
गलियों से उठती चीखें 
कि फैला उन्माद अंध

कुस्वार्थ सने इन श्वानों के
जुगलबंदी से सम्भालो

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इस ब्लाग की रचनाये स्वयं लेखकों के द्वारा दी गई है तथा इन रचनाओं का स्वताधिकार उनके पास है। धन्यवाद।



संक्षिप्त परिचय

नाम : मार्त्तण्ड
जन्म : 02 जुलाई 1951, परसाहाट, प्रखंड - रानीगंज, जिला - अररिया (बिहार)
शिक्षा : बी. एस. सी. फिजिक्स ऑनर्स, बी. ए. (हिंदी एवं मैथिली)
माता : यशः शेष कौशल्या देवी
पिता : यशः शेष रामजी मिश्र

प्रकाशित कृतियाँ : अग्नि-शिखा (काव्य-संग्रह), दूर्वादल के ज़ख्म, अंधियारा है बहुत (ग़ज़ल-संग्रह), कोहरे में कसमसाता सूरज (गीत-ग़ज़ल-काव्य संग्रह), कासौं कहौं दुखवा हो रामा ( कहानी-संग्रह), साँस-साँस पर पहरा है (गीत-संग्रह), शिखरों की छाँव में(यात्रा-साहित्य), एक गीत संग्रह मैथिली में, रोटी है पूनम जैसी (नवगीत संग्रह) तथा कई अन्य प्रकाश्य कृतियां

सम्मान : राष्ट्रीय एवं प्रांतीय स्तर के कई दर्जन सम्मान/पुरस्कार, संपादन में भी कई सम्मान/ पुरस्कार प्राप्त

संप्रति : स्वतंत्र लेखन (हिंदी एवं मैथिली), प्रधान संपादक "संवदिया", राष्ट्रीय स्तर की पत्र/ पत्रिकाओं में विभिन्न विधाओं का निरंतर प्रकाशन,
आकाशवाणी भागलपुर, पूर्णिया, दरभंगा में काव्य, कहानी, समीक्षा का पाठ, दूरदर्शन, पटना से काव्य पाठ

संपर्क : 'साकेत', बंगाली टोला, फारबिसगंज - 854318 (अररिया), बिहार
मो. : 9973269906
मेल : marttand51@gmail.com 





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